नई दिल्ली। शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चल रहे शिवसेना विवाद की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या किसी राजनीतिक पार्टी का प्रतिनिधित्व तय करने के लिए विधायी बहुमत को हमेशा निर्णायक और सुरक्षित पैमाना माना जा सकता है, खासकर तब जब उसी बहुमत का हिस्सा रहे विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही लंबित हो। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं।
सुनवाई के दौरान यह सवाल एकनाथ शिंदे गुट की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल की दलीलों के संदर्भ में उठा। कौल ने निर्वाचन आयोग के उस फैसले का बचाव किया, जिसमें शिंदे गुट को शिवसेना के रूप में मान्यता देते हुए पार्टी का नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न आवंटित किया गया था।
विधायी बहुमत पर सुप्रीम कोर्ट का सवाल
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सवाल किया कि अगर विधायी बहुमत को पार्टी का प्रतिनिधित्व तय करने का एक प्रासंगिक पैमाना माना भी जाए, तो क्या यह हर स्थिति में निर्णायक हो सकता है। खासकर ऐसी स्थिति में, जहां विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही चल रही हो और उसके नतीजे से विधायी संख्या बदल सकती हो।
कोर्ट की टिप्पणी का संदर्भ 2022 के शिवसेना विभाजन और उसके बाद निर्वाचन आयोग के समक्ष दोनों गुटों के दावों से जुड़ा है। शिंदे गुट ने दलील दी है कि निर्वाचन आयोग ने केवल विधानसभा में विधायकों की संख्या के आधार पर फैसला नहीं किया, बल्कि पार्टी के संविधान, उद्देश्यों और संगठन से संबंधित सामग्री पर भी विचार किया था।
शिंदे गुट ने विधायी बहुमत को कैसे सही ठहराया?
शिंदे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने कहा कि निर्वाचन आयोग के सामने उपलब्ध विभिन्न परीक्षणों में परिस्थितियों को देखते हुए विधायी बहुमत एक महत्वपूर्ण और व्यावहारिक आधार था। उन्होंने तर्क दिया कि पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में बड़ी संख्या में नामित सदस्यों की वजह से संगठनात्मक बहुमत का परीक्षण भी स्पष्ट परिणाम नहीं दे सकता था।
कौल ने यह भी कहा कि 2022 का विवाद केवल विधानसभा में विभाजन तक सीमित नहीं था, बल्कि पार्टी के संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष भी मौजूद था। उनके अनुसार, निर्वाचन आयोग ने इसी व्यापक राजनीतिक संगठनात्मक स्थिति को देखते हुए संविधान, पार्टी के उद्देश्य और अन्य सामग्री पर विचार किया था।
उद्धव गुट ने निर्वाचन आयोग के फैसले पर क्या कहा?
उद्धव ठाकरे गुट की ओर से निर्वाचन आयोग के 17 फरवरी 2023 के फैसले को चुनौती दी गई है। इस फैसले में आयोग ने शिंदे गुट को शिवसेना का नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न आवंटित किया था। उद्धव गुट का तर्क है कि विधानसभा में विधायकों की संख्या को पूरी राजनीतिक पार्टी का प्रतिनिधित्व मानना सही नहीं है।
उद्धव गुट की ओर से यह भी दलील दी गई है कि राजनीतिक पार्टी और उसकी विधायी पार्टी अलग-अलग संस्थाएं हैं। उसके मुताबिक, विधायकों की संख्या के आधार पर विधायी बहुमत को पूरी राजनीतिक पार्टी का बहुमत नहीं माना जा सकता।
पहले भी उठा था ‘शिवसेना किसे कहते हैं’ का सवाल
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले यह सवाल भी उठाया था कि ‘शिवसेना’ से आशय पूरी राजनीतिक पार्टी से है, उसकी कार्यसमिति से है या विधायी दल से। यह सवाल निर्वाचन आयोग के उस निर्णय की न्यायिक समीक्षा के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, जिसमें शिंदे गुट को पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न दिया गया था।
उद्धव गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी थी कि पार्टी और विधायी दल को एक नहीं माना जा सकता। उन्होंने पार्टी संविधान और संगठनात्मक प्रक्रिया का हवाला देते हुए कहा था कि पार्टी के प्रमुख को हटाने और नया नेतृत्व तय करने की प्रक्रिया पार्टी के संविधान के मुताबिक होनी चाहिए।
अयोग्यता की कार्यवाही का मुद्दा क्यों महत्वपूर्ण है?
मामले में एक अहम सवाल यह भी है कि अगर विधायकों की संख्या को पार्टी का प्रतिनिधित्व तय करने का आधार बनाया जाए और बाद में उन्हीं विधायकों के खिलाफ दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता की कार्यवाही में स्थिति बदल जाए, तो पहले तय किया गया बहुमत कितना स्थिर माना जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की 2023 की संविधान पीठ के फैसले में भी इस बात पर चर्चा हुई थी कि जब अयोग्यता की कार्यवाही लंबित हो, तब केवल विधायी बहुमत के आधार पर पार्टी के वास्तविक प्रतिनिधित्व का फैसला करना समस्याग्रस्त हो सकता है।
निर्वाचन आयोग के फैसले पर क्या है विवाद?
निर्वाचन आयोग ने 17 फरवरी 2023 को शिवसेना के नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न पर शिंदे गुट के पक्ष में फैसला दिया था। आयोग के आदेश में विधायी बहुमत के परीक्षण को महत्वपूर्ण माना गया था। आयोग ने अपने आदेश में विधानसभा और लोकसभा चुनावों में संबंधित विधायकों और सांसदों को मिले वोटों के आंकड़ों का भी विश्लेषण किया था।
उद्धव गुट ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। दूसरी ओर, शिंदे गुट का कहना है कि आयोग ने उपलब्ध कानूनी परीक्षणों और पार्टी से संबंधित सामग्री पर विचार करने के बाद फैसला किया था।
सुप्रीम कोर्ट में अब आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई अभी जारी है। अदालत के सामने मुख्य विवादों में यह सवाल शामिल है कि निर्वाचन आयोग ने पार्टी के वास्तविक प्रतिनिधित्व का निर्धारण करते समय कौन-से परीक्षण अपनाए और क्या विधायी बहुमत को उस परिस्थिति में निर्णायक आधार बनाया जा सकता था, जब संबंधित विधायकों की अयोग्यता का सवाल भी लंबित था।
अदालत का अंतिम फैसला अभी नहीं आया है। इसलिए फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को अंतिम निर्णय के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।
क्या है शिवसेना नाम और धनुष-बाण का विवाद?
2022 में शिवसेना में विभाजन के बाद एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट और उद्धव ठाकरे गुट ने पार्टी पर अपना-अपना दावा किया। दोनों गुटों के बीच विवाद निर्वाचन आयोग तक पहुंचा। 17 फरवरी 2023 को निर्वाचन आयोग ने शिंदे गुट को शिवसेना का नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न आवंटित किया।
उद्धव गुट ने निर्वाचन आयोग के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। इसी से जुड़े मामले में विधायी दल और राजनीतिक पार्टी के बीच अंतर, पार्टी संगठन का बहुमत, विधायकों की संख्या और अयोग्यता की कार्यवाही जैसे मुद्दे सुप्रीम कोर्ट के सामने हैं। मामले में महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष के अयोग्यता संबंधी फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाएं भी जुड़ी हुई हैं।
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