ईशा फाउंडेशन को 1 रुपये में 15 एकड़ जमीन।
बिहार में आध्यात्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर सरकार ने मुंगेर के तारापुर में ईशा फाउंडेशन को 15 एकड़ 01 डिसमिल यानी 15.01 एकड़ सरकारी जमीन 99 साल के लिए महज 1 रुपये सालाना के टोकन रेंट पर देने का फैसला किया है। इस जमीन पर योग एवं वेलनेस सेंटर, भव्य आदियोगी प्रतिमा और आध्यात्मिक-पर्यटन से जुड़ी आधुनिक सुविधाएं विकसित की जानी हैं।
सरकार इसे तारापुर को वैश्विक आध्यात्मिक पर्यटन केंद्र बनाने की दिशा में बड़ा कदम बता रही है। लेकिन सरकारी फैसले का दूसरा पहलू भी है।
जिस जमीन का किराया साल में सिर्फ 1 रुपया होगा, उस जमीन पर बनने वाले योग और वेलनेस कारोबार से ईशा फाउंडेशन कितना कमाएगा और बिहार की जनता को क्या मिलेगा?
यही सवाल अब इस पूरे प्रोजेक्ट का सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक और सार्वजनिक हित का मुद्दा बन गया है।
फैसला 10 अगस्त को नहीं, 24 जून को हो चुका था
इस मामले में बिहार कैबिनेट का मूल दस्तावेज पूरे घटनाक्रम को और महत्वपूर्ण बना देता है।
24 जून 2026 को बिहार कैबिनेट ने पर्यटन विभाग के प्रस्ताव पर MOU के प्रारूप को मंजूरी दी थी।
कैबिनेट के निर्णय संख्या 21 में साफ दर्ज है कि मुंगेर जिले के तारापुर अंचल के मौजा-गाजीपुर में स्थित 15 एकड़ 01 डिसमिल जमीन को ईशा फाउंडेशन, ईशा योग केंद्र, वेल्लियांगिरी फुटहिल, कोयंबटूर, तमिलनाडु को 1 रुपये के टोकन मूल्य पर 99 वर्ष की लीज के लिए समझौता ज्ञापन यानी MOU करने की स्वीकृति दी गई।
यानी-
जमीन — 15.01 एकड़
लीज — 99 साल
टोकन रेंट- ₹1 सालाना
ये सिर्फ किसी प्रेस रिलीज के दावे नहीं हैं, बल्कि कैबिनेट के फैसले में दर्ज शर्तें हैं। इसके करीब डेढ़ महीने बाद 10 अगस्त को पर्यटन विभाग ने प्रेस रिलीज जारी कर इस फैसले की विस्तृत जानकारी सार्वजनिक की।

कैबिनेट की मंजूरी के दो दिन बाद Sadhguru की मुख्यमंत्री से मुलाकात
इस पूरे घटनाक्रम में एक और तारीख बेहद महत्वपूर्ण है।
26 जून 2026 को ईशा फाउंडेशन के संस्थापक Sadhguru जग्गी वासुदेव बिहार पहुंचे और पटना में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से मुलाकात की। रिपोर्ट के मुताबिक मुख्यमंत्री ने उनका स्वागत राज्य अतिथि के रूप में किया। Sadhguru ने इसके बाद वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों से भी मुलाकात की थी।
यहां एक बात बिल्कुल स्पष्ट रखना जरूरी है।
कैबिनेट की मंजूरी 24 जून को हो चुकी थी और मुख्यमंत्री से Sadhguru की मुलाकात 26 जून को हुई। इसलिए इन दोनों घटनाओं के बीच किसी तरह का सीधा कारण-संबंध स्थापित करना उचित नहीं होगा।
लेकिन टाइमलाइन सवाल जरूर खड़ा करती है-
ईशा फाउंडेशन और बिहार सरकार के बीच इस परियोजना को लेकर बातचीत कब शुरू हुई?
प्रस्ताव कब आया?
15.01 एकड़ जमीन को 99 साल के लिए ₹1 सालाना पर देने का मॉडल किस स्तर पर तय हुआ?
और-
MOU की पूरी आर्थिक शर्तें जनता के सामने क्यों नहीं हैं?
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ईशा फाउंडेशन को 1 रुपये में 15 एकड़ जमीन : अब सवाल जमीन से आगे-करोड़ों के संभावित कारोबार का
तारापुर में सरकार के अनुसार सिर्फ एक साधारण योग केंद्र नहीं बनने जा रहा।
यहां-
- अंतरराष्ट्रीय स्तर का योग केंद्र,
- आदियोगी की भव्य प्रतिमा,
- ध्यान एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम,
- वेलनेस गतिविधियां,
- पर्यटन सुविधाएं,
- सांस्कृतिक अवसंरचना
विकसित करने की योजना है। अगर परियोजना सरकार के दावे के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय पर्यटन केंद्र बनती है तो देश-विदेश से बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंच सकते हैं। और यहीं से कमाई का सवाल पैदा होता है।
योग कार्यक्रम।
ध्यान कार्यक्रम।
वेलनेस रिट्रीट।
आवास।
भोजन।
प्रशिक्षण।
विशेष आध्यात्मिक कार्यक्रम।
पर्यटन से जुड़ी दूसरी सेवाएं।
इन सबका शुल्क आधारित मॉडल बनाया जाता है तो एक बड़े कारोबार की संभावना पैदा होती है।
ईशा के मौजूदा मॉडल में शुल्क हजारों से लाखों तक
यह सवाल सिर्फ अनुमान पर आधारित नहीं है कि Isha की गतिविधियों में शुल्क आधारित कार्यक्रम होते हैं। ईशा की अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर Classical Hatha Yoga के 8-दिवसीय कार्यक्रम की फीस ₹13,500 से ₹60,000 तक दिखाई गई है, जो आवास की श्रेणी के अनुसार बदलती है।
इसी तरह उसकी वेबसाइट पर Inner Engineering कार्यक्रम की एक मौजूदा पेशकश की फीस ₹4,500 बताई गई है।एक अन्य Isha कार्यक्रम में तीन दिन के लिए फीस ₹3,500 से ₹50,000 तक दिखाई गई है। इसका मतलब यह नहीं है कि तारापुर में भी यही फीस होगी। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं यहां से परोपकार के काम होंगे?
लिहाजा इससे यह सवाल बिल्कुल जायज हो जाता है कि-
जब 15.01 एकड़ जमीन 99 साल के लिए सिर्फ ₹1 सालाना पर दी जा रही है, तो उस जमीन पर बनने वाली शुल्क आधारित गतिविधियों से होने वाली कमाई का हिस्सा बिहार को कितना मिलेगा?

करोड़ों की कमाई की संभावना, लेकिन हिसाब कहां है?
मान लीजिए तारापुर केंद्र में सिर्फ 10,000 लोग किसी एक वर्ष में औसतन ₹10,000 का भुगतान करने वाले कार्यक्रमों में शामिल होते हैं। तो सकल कारोबार ₹10 करोड़ हो सकता है। अगर 20,000 लोग हों तो यही गणना ₹20 करोड़ तक पहुंच सकती है। और अगर आवास, भोजन, रिट्रीट तथा अन्य सेवाएं इसमें शामिल हों तो आर्थिक गतिविधि इससे भी काफी बड़ी हो सकती है। लेकिन ये वास्तविक अनुमान नहीं हैं- सिर्फ संभावित Revenue Scenarios हैं।
वास्तविक कमाई तभी बताई जा सकती है जब सरकार या MOU में परियोजना की क्षमता, फीस, आगंतुक संख्या और वित्तीय मॉडल सामने आए। इसलिए सरकार से सीधा सवाल है-
क्या तारापुर परियोजना को मंजूरी देने से पहले इसकी अनुमानित वार्षिक आय और आर्थिक गतिविधि का आकलन किया गया था?
अगर किया गया है तो वह आंकड़ा सार्वजनिक किया जाए। कई लोकतांत्रिक सरकार मनमाना फैसला नहीं कर सकती। अगर ऐसा करती है तो कुछ न कुछ गड़बड़ है। दाल में कुछ काला है। बिहार सरकार को ये तस्वीर साफ करनी चाहिए।
₹1 की जमीन पर करोड़ों का कारोबार हुआ तो बिहार को क्या मिलेगा?
यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है। सरकार जमीन दे रही है। वह भी 99 साल के लिए। रेंट सिर्फ ₹1 सालाना।अब अगर इस जमीन पर बनने वाले केंद्र से करोड़ों रुपये की आर्थिक गतिविधि होती है तो-
बिहार सरकार को क्या मिलेगा?
- क्या सरकार को Revenue Sharing मिलेगा?
- क्या स्थानीय निकाय को कोई हिस्सा मिलेगा?
- क्या कोई वार्षिक लाइसेंस शुल्क होगा?
- क्या टर्नओवर के आधार पर कोई शुल्क लिया जाएगा?
- क्या परियोजना की कमाई का ऑडिट सरकार कर सकेगी?
- क्या स्थानीय युवाओं के रोजगार के लिए कोई बाध्यकारी शर्त है?
- क्या स्थानीय लोगों के लिए योग एवं वेलनेस सुविधाएं मुफ्त या रियायती दर पर उपलब्ध होंगी?
- MOU की वास्तविक वित्तीय शर्तें इन सवालों का जवाब देंगी।
बांस घाट: ईशा से जुड़ा दूसरा बड़ा आर्थिक सवाल
तारापुर का मामला इसलिए भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि इससे पहले पटना के बांस घाट में ईशा आउटरीच की भूमिका सामने आई है।
पटना नगर निगम ने ईशा आउटरीच के साथ बांस घाट श्मशान गृह के पांच वर्ष के संचालन एवं रखरखाव के लिए समझौता किया है। इसके तहत इलेक्ट्रिक और लकड़ी आधारित शवदाह व्यवस्था के साथ रिकॉर्ड-कीपिंग और दूसरी सुविधाओं का संचालन भी शामिल है।
बांस घाट की आधुनिक परियोजना करीब 4.5 एकड़ में विकसित हुई है और इसमें 18 cremation platforms हैं। Hindustan Times के मुताबिक वहां इलेक्ट्रिक शवदाह के लिए शुल्क ₹3,500 से शुरू होता है।
वहीं Times of India की रिपोर्ट के मुताबिक अंतिम संस्कार सेवाओं के लिए ₹3,500 से ₹5,000 तक शुल्क प्रस्तावित है और इसे समय-समय पर संशोधित किया जा सकता है। पारंपरिक दाह-संस्कार के लिए लकड़ी का खर्च अलग है।
बांस घाट में सुविधा बढ़ी, लेकिन परिवारों पर शुल्क भी आया
यहां एक महत्वपूर्ण फर्क समझना जरूरी है। बांस घाट की नई व्यवस्था में आधुनिक सुविधाएं बढ़ी हैं—इलेक्ट्रिक शवदाह, प्रतीक्षालय, पानी, शौचालय, पार्किंग और दूसरी सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि लोगों को कोई सुविधा नहीं मिली। लेकिन दूसरी तरफ अंतिम संस्कार के लिए शुल्क आधारित व्यवस्था भी सामने आई है।
यही वह बिंदु है जहां जनता के पैसे और निजी संस्था की आर्थिक भूमिका का सवाल उठता है। करीब 89.40 करोड़ रुपये की लागत वाली इस परियोजना में-
कुल संचालन खर्च कितना है?
पांच साल में शुल्क से कितना राजस्व आने का अनुमान है?
उस राजस्व में ईशा आउटरीच की भूमिका और हिस्सा क्या है?
पटना नगर निगम को कितना मिलेगा?
इन सवालों का पूरा वित्तीय विवरण सार्वजनिक होना चाहिए।
बांस घाट से तारापुर तक एक पैटर्न का सवाल
एक तरफ-
बांस घाट: सार्वजनिक निवेश से विकसित आधुनिक सुविधा + ईशा आउटरीच का संचालन + अंतिम संस्कार पर शुल्क।
दूसरी तरफ-
तारापुर: 15.01 एकड़ सरकारी जमीन + 99 साल की लीज + ₹1 सालाना + योग-वेलनेस और पर्यटन गतिविधियां।
इन दोनों मामलों को एक साथ रखकर सवाल उठाना स्वाभाविक है-
क्या बिहार सरकार सार्वजनिक संसाधनों और जमीन के जरिए ईशा से जुड़ी संस्थाओं के लिए लंबे समय की आर्थिक गतिविधियों का आधार तैयार कर रही है?
यह आरोप नहीं है। यह सरकार से जवाब मांगने वाला सवाल है। क्या यह जनता पर लगाया गया अप्रत्यक्ष जजिया कर की तरह नहीं है। बिहार सरकार को इसका जवाब देना चाहिए?
सरकारी जमीन का असली मूल्य कितना?
15.01 एकड़ जमीन को 99 साल के लिए ₹1 सालाना पर देने से पहले सरकार ने इस जमीन का मूल्यांकन कितना किया?
- क्या बाजार मूल्य तय किया गया?
- क्या जमीन का वैकल्पिक उपयोग देखा गया?
- अगर यही जमीन किसी दूसरे पर्यटन या वेलनेस प्रोजेक्ट को दी जाती तो सरकार कितना राजस्व हासिल कर सकती थी?
- क्या ₹1 का टोकन रेंट किसी विशेष नीति के तहत तय हुआ?
- और क्या यही नीति दूसरे संस्थानों के लिए भी उपलब्ध है?
- सरकार को यह सब सार्वजनिक करना चाहिए।
99 साल की लीज—इतनी लंबी अवधि क्यों?
- यह भी सामान्य सवाल है।
- सरकार ने 99 वर्ष की अवधि क्यों चुनी?
- क्या परियोजना के प्रदर्शन की हर पांच या दस वर्ष में समीक्षा होगी?
- अगर परियोजना तय समय पर पूरी नहीं होती तो जमीन वापस होगी?
- अगर परियोजना बंद हो जाती है तो जमीन का क्या होगा?
- क्या संस्था जमीन या उस पर बनी संपत्ति के किसी हिस्से को आगे हस्तांतरित कर सकेगी?
- 99 साल बाद जमीन और उस पर बनी संरचनाओं का क्या होगा?
- इन सभी सवालों का जवाब MOU में होना चाहिए।
तारापुर का विकास जरूरी, लेकिन जनता का आर्थिक हित भी जरूरी
तारापुर धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र है। शिव परिपथ और कांवरिया पथ से जुड़ाव इसे पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाता है। अगर ईशा फाउंडेशन का प्रस्तावित केंद्र वास्तव में देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करता है, रोजगार पैदा करता है और स्थानीय दुकानदारों, होटल, परिवहन तथा दूसरे व्यवसायों को लाभ पहुंचाता है तो यह बिहार के लिए सकारात्मक हो सकता है। लेकिन सवाल यह है कि-
उस विकास में सबसे बड़ा आर्थिक लाभ किसे मिलेगा?
ईशा फाउंडेशन को?
स्थानीय कारोबारियों को?
सरकार को?
या स्थानीय जनता को?

बिहार सरकार से FreelancerPost के 12 सीधे सवाल
1. 15.01 एकड़ जमीन का वर्तमान सरकारी मूल्यांकन कितना है?
2. 99 साल की लीज के लिए ₹1 सालाना टोकन रेंट तय करने का आधार क्या है?
3. ईशा फाउंडेशन का चयन किस प्रक्रिया से हुआ?
4. क्या अन्य संस्थाओं से भी प्रस्ताव मांगे गए थे?
5. तारापुर परियोजना में ईशा फाउंडेशन का कुल निवेश कितना होगा?
6. योग, वेलनेस, रिट्रीट और आवासीय कार्यक्रमों की फीस कौन तय करेगा?
7. सरकार ने परियोजना की अनुमानित सालाना आय/टर्नओवर का आकलन किया है या नहीं?
8. अगर परियोजना से करोड़ों रुपये का कारोबार होता है तो बिहार सरकार को कितना राजस्व मिलेगा?
9. क्या MOU में Revenue Sharing का प्रावधान है?
10. क्या सरकार परियोजना के खातों और राजस्व का ऑडिट कर सकेगी?
11. परियोजना विफल होने या बंद होने पर जमीन वापस लेने की क्या शर्त है?
12. 24 जून को कैबिनेट द्वारा मंजूर MOU की पूरी वित्तीय और व्यावसायिक शर्तें जनता के सामने कब रखी जाएंगी
ईशा फाउंडेशन से FreelancerPost के सवाल
- तारापुर में कुल निवेश कितना होगा?
- परियोजना से कितनी नौकरियां पैदा होंगी?
- कौन-कौन सी सेवाएं शुल्क आधारित होंगी?
- स्थानीय लोगों के लिए क्या सुविधाएं होंगी?
- सरकार को Revenue Sharing मिलेगा या नहीं?
- 99 साल की लीज के बदले संस्था की सार्वजनिक जिम्मेदारियां क्या होंगी?
ईशा फाउंडेशन का जवाब मिलने पर FreelancerPost उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित करेगा। नहीं मिलने पर सवाल उठते रहेंगे। जनता के हितों के आवाज बुलंद होते रहेंगे।
क्योंकि सवाल Sadhguru या योग का नहीं, जनता के संसाधन का है
तारापुर में योग और वेलनेस सेंटर बनना अपने आप में कोई गलत बात नहीं है। Sadhguru का बिहार आना और मुख्यमंत्री से मिलना भी अपने आप में कोई अनियमितता साबित नहीं करता। लेकिन घटनाक्रम की तारीखें महत्वपूर्ण हैं-
24 जून — कैबिनेट ने MOU को मंजूरी दी।
26 जून — Sadhguru ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से मुलाकात की।
10 अगस्त — सरकार ने प्रेस रिलीज जारी कर परियोजना की जानकारी सार्वजनिक की।
और इन सबके बीच सरकारी दस्तावेज कहता है-
15.01 एकड़ जमीन, 99 साल की लीज और ₹1 सालाना टोकन रेंट।
अब बिहार की जनता का सवाल बिल्कुल सीधा है-
अगर इस जमीन पर बनने वाले योग और वेलनेस सेंटर से हर साल करोड़ों रुपये का कारोबार होता है, तो उस कमाई में बिहार की जनता का हिस्सा कितना होगा?
सरकार को सिर्फ यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि तारापुर को विश्वस्तरीय पहचान मिलेगी।
जनता यह भी जानना चाहती है कि उसकी जमीन से बनने वाली आर्थिक दुनिया में जनता के हिस्से में क्या आएगा?
पर्यटन बढ़े—बिल्कुल।
रोजगार मिले—जरूर।
तारापुर की पहचान विश्व स्तर पर बने—स्वागत है।
लेकिन साथ में-
“सरकारी जमीन का मूल्य, 99 साल की लीज की शर्तें और उससे होने वाली संभावित कमाई का पूरा हिसाब भी सार्वजनिक हो।”
और FreelancerPost का भी बिहार सरकार और ईशा फाउंडेशन से यही सवाल। जवाब आने पर हम उनके जवाब को भी प्रकाशित करेंगे। और जब तक जवाब नहीं आ जाते जनता के सवालों को हम प्रमुख्ता से उठाते रहेंगे।
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