नई दिल्ली। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई हैं। पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने निर्वाचन आयोग (ECI) के उस अंतरिम फैसले को चुनौती दी है, जिसमें पार्टी के आधिकारिक नाम ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ और उसके पारंपरिक ‘फूल और घास’ चुनाव चिह्न के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई थी।
ममता बनर्जी ने यह याचिका 18 सितंबर को दाखिल की। याचिका में निर्वाचन आयोग के साथ पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी को भी प्रतिवादी बनाया गया है। यह विवाद TMC के भीतर संगठन और पार्टी की पहचान पर नियंत्रण को लेकर ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले दो गुटों के बीच चल रही लड़ाई से जुड़ा है।
17 सितंबर को EC ने फ्रीज किया था TMC का नाम और चिह्न
निर्वाचन आयोग ने 17 सितंबर को अंतरिम आदेश जारी करते हुए दोनों गुटों को ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फूल और घास’ के आरक्षित चुनाव चिह्न का इस्तेमाल करने से रोक दिया था।
आयोग ने दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न के विकल्प देने को कहा था। यह व्यवस्था पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा उपचुनावों को देखते हुए की गई।
18 सितंबर को दोनों गुटों को मिले अलग नाम और चिह्न
इसके अगले दिन, 18 सितंबर को निर्वाचन आयोग ने दोनों गुटों के लिए अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित कर दिए। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ चुनाव चिह्न दिया गया।
वहीं दूसरे गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न आवंटित किया गया। आयोग के मुताबिक यह व्यवस्था आगामी उपचुनावों के लिए अंतरिम तौर पर लागू होगी।
पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर 6 अक्टूबर को उपचुनाव होना है। ऐसे में पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर विवाद का सीधा असर चुनावी प्रक्रिया पर पड़ सकता है।
आखिर TMC में विवाद शुरू कैसे हुआ?
TMC का मौजूदा संकट अचानक सामने नहीं आया। जून 2026 में पार्टी का विवाद विधानसभा के भीतर खुलकर सामने आया। करीब 58 विधायकों ने पार्टी के निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी के समर्थन में विधानसभा अध्यक्ष को पत्र दिया और उन्हें विपक्ष का नेता बनाए जाने का समर्थन किया। विधानसभा अध्यक्ष ने उनके दावे को स्वीकार किया। इससे TMC के विधायी दल में ममता बनर्जी के नेतृत्व को लेकर खुला विवाद सामने आ गया।
पार्टी की ओर से इस फैसले को चुनौती भी दी गई। सोवनदेब चट्टोपाध्याय ने कलकत्ता हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसमें ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता देने के विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को चुनौती दी गई।
विवाद संसद तक भी पहुंचा

इसके बाद TMC का विवाद संसद तक पहुंच गया। जून में सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने दावा किया कि 20 TMC सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र देकर अलग बैठने और NDA के साथ सहयोग करने की इच्छा जताई है।
बाद में इन सांसदों के एक अलग समूह के रूप में Nationalist Citizens Party of India (NCPI) में विलय और NDA के साथ सहयोग की बात भी सामने आई। यह घटनाक्रम TMC के संसदीय संगठन में भी विभाजन का संकेत बना।
ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट क्यों पहुंची?
अब विवाद का एक अहम हिस्सा सुप्रीम कोर्ट के सामने है। ममता बनर्जी ने निर्वाचन आयोग के उस अंतरिम फैसले को चुनौती दी है, जिसके तहत दोनों गुटों को मूल TMC नाम और पारंपरिक चुनाव चिह्न इस्तेमाल करने से रोक दिया गया है।
दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग ने फिलहाल दोनों गुटों के लिए अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न तय कर दिए हैं, ताकि आगामी उपचुनावों में दोनों पक्षों की पहचान अलग रहे। आयोग का यह प्रबंध अभी अंतरिम है; पार्टी के नाम, चिह्न और संगठनात्मक नियंत्रण को लेकर अंतिम स्थिति इस कानूनी और संगठनात्मक विवाद के आगे के नतीजों पर निर्भर करेगी।
28 साल बाद TMC की पहचान पर सबसे बड़ा विवाद
तृणमूल कांग्रेस की स्थापना जनवरी 1998 में हुई थी। 2026 में पार्टी के भीतर सामने आया यह विभाजन उसकी संगठनात्मक पहचान, विधानसभा में नेतृत्व और अब पार्टी के नाम-चिह्न तक पहुंच चुका है। निर्वाचन आयोग के 17 और 18 सितंबर के आदेशों के बाद पहली बार आगामी उपचुनावों में दोनों गुट मूल ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और पारंपरिक ‘फूल और घास’ चिह्न के बजाय अलग पहचान के साथ मैदान में होंगे।
अब नजर सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही पर है, जहां ममता बनर्जी ने निर्वाचन आयोग के अंतरिम फैसले को चुनौती दी है।
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