राज्यपाल बोले- भारत ज्ञान का उपभोक्ता नहीं, सृजक बने; कुलपति ने भारतीय ज्ञान परंपरा को प्रमाण-आधारित अध्ययन से जोड़ने पर दिया जोर
राजगीर। नालंदा विश्वविद्यालय में दो दिनों तक चली राष्ट्रीय परिचर्चा का सबसे महत्वपूर्ण सवाल शायद यह नहीं था कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा कितनी समृद्ध रही है। इस पर तो इतिहास के पन्ने गवाही देते हैं। असली सवाल यह था कि उस ज्ञान को आज के भारत की जरूरतों से कैसे जोड़ा जाए?
राजगीर स्थित नालंदा विश्वविद्यालय में 21 और 22 सितंबर को ‘विकसित भारत के निर्माण में भारतीय ज्ञान परंपरा की भूमिका’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय परिसंवाद में इसी सवाल के अलग-अलग पहलुओं पर मंथन हुआ। नालंदा विश्वविद्यालय और शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के संयुक्त तत्वावधान में हुए इस आयोजन में देशभर के शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, विश्वविद्यालयों के कुलपतियों और तकनीकी संस्थानों के निदेशकों ने हिस्सा लिया। विश्वविद्यालय के अनुसार परिसंवाद में 15 से अधिक कुलपति और 12 से अधिक तकनीकी संस्थानों के निदेशक शामिल हुए।
लेकिन दो दिन के इस आयोजन को सिर्फ एक अकादमिक कार्यक्रम मानना इसकी पूरी तस्वीर नहीं होगी। नालंदा विश्वविद्यालय में हुई चर्चा का केंद्र था- क्या भारत अपनी पुरानी ज्ञान परंपरा को आधुनिक विज्ञान, तकनीक, शोध और नवाचार से जोड़कर नए ज्ञान का निर्माण कर सकता है?
राज्यपाल ने बदल दिया सवाल का केंद्र

परिसंवाद का उद्घाटन बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैय्यद अता हसनैन ने किया। अपने संबोधन में उन्होंने विकसित भारत को केवल आर्थिक विकास और राष्ट्रीय शक्ति तक सीमित न रखते हुए ज्ञान-सृजन और दुनिया के लिए समाधान देने की क्षमता से जोड़ने की बात कही।
राज्यपाल ने कहा कि भारत को केवल ज्ञान का उपभोक्ता नहीं, बल्कि ज्ञान का सृजक बनना होगा। उनका जोर इस बात पर था कि भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल गौरव के रूप में याद करने के बजाय उससे जुड़े सवालों को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़कर देखा जाए।
उन्होंने नालंदा को इसी दृष्टि से देखने की बात कही-प्राचीन नालंदा भारत की विरासत है, लेकिन भविष्य का नालंदा भारत का लक्ष्य होना चाहिए।
यही वह बिंदु था जिसने पूरे परिसंवाद को अतीत की चर्चा से निकालकर भविष्य की बहस में पहुंचा दिया।
‘नालंदा दृष्टिकोण’ का मतलब सिर्फ पुराना गौरव नहीं
राज्यपाल के संबोधन में ‘नालंदा दृष्टिकोण’ एक महत्वपूर्ण विचार के रूप में सामने आया। इसका आशय ऐसी ज्ञान परंपरा से है जिसकी जड़ें भारतीय सभ्यता में हों, लेकिन जिसकी दृष्टि दुनिया तक जाती हो।

नालंदा का ऐतिहासिक स्वरूप भी इसी तरह का रहा है। इसलिए यहां हुई चर्चा का एक बड़ा सवाल यह रहा कि क्या आधुनिक नालंदा फिर से ऐसा स्थान बन सकता है जहां दुनिया भारत से केवल शिक्षा लेने नहीं, बल्कि नए विचारों और समाधानों के लिए आए?
यही वजह है कि भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक विज्ञान, तकनीक, नवाचार और वैश्विक ज्ञान-विनिमय से जोड़ने पर विशेष जोर दिया गया।
कुलपति ने कहा- ज्ञान को अलग-अलग खांचों में नहीं बांटा जा सकता
नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी ने भारतीय ज्ञान परंपरा को किसी एक विषय या अलग शैक्षणिक खांचे में रखने के बजाय विभिन्न ज्ञान-विधाओं से जोड़ने की जरूरत बताई।
समापन सत्र में भी उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा की व्यापकता और सार्वभौमिक स्वरूप को रेखांकित किया। उनका कहना था कि भारतीय सभ्यता के विस्तार के पीछे ऐसा ज्ञान था जो सामान्य लोगों के लिए उपयोगी, सहज और व्यापक रूप से उपलब्ध था।
यहां से चर्चा एक और महत्वपूर्ण सवाल की ओर जाती है- आज भारतीय ज्ञान को विश्वविद्यालयों में किस तरह पढ़ाया जाए? क्या उसे केवल एक अलग विषय बनाकर पढ़ाया जाए या फिर गणित, विज्ञान, समाजशास्त्र, पर्यावरण, कृषि, चिकित्सा, तकनीक और मानविकी जैसे विषयों के साथ जोड़कर देखा जाए?
परिसंवाद में इसी व्यापक दृष्टिकोण पर जोर दिखाई दिया।
प्राचीन ज्ञान को प्रमाण के साथ समझने पर जोर
परिसंवाद में प्रो. रमेश भारद्वाज ने भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा में पुनर्स्थापित करने के साथ उसके प्रामाणिक पाठ्य और पुरातात्विक साक्ष्यों को सामने लाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
यह पहलू इस पूरे विमर्श के लिए महत्वपूर्ण है। क्योंकि भारतीय ज्ञान परंपरा पर चर्चा करते समय एक तरफ उसके ऐतिहासिक योगदान को समझने की जरूरत है, तो दूसरी तरफ यह भी जरूरी है कि किन दावों का आधार प्रामाणिक ग्रंथ, पुरातात्विक साक्ष्य या शोध हैं और किन बातों को बाद की व्याख्याओं के रूप में देखा जाना चाहिए।
यानी नालंदा की चर्चा केवल ‘गौरव’ की चर्चा नहीं, बल्कि स्रोत, प्रमाण और शोध की भी चर्चा बन गई।

प्रो. भूषण पटवर्धन ने ज्ञान को नवाचार से जोड़ने की बात कही
यूजीसी के पूर्व उपाध्यक्ष प्रो. भूषण पटवर्धन ने भारतीय ज्ञान को संवाद और निरंतरता के साथ समझने तथा प्राचीन ज्ञान को नवाचार के स्रोत के रूप में देखने की आवश्यकता पर बल दिया।
इसका अर्थ यह है कि किसी प्राचीन विचार को केवल इसलिए उपयोगी नहीं मान लिया जाए कि वह पुराना है। बल्कि यह देखा जाए कि उसमें ऐसा क्या है जिसे आधुनिक परिस्थितियों में समझा, परखा और विकसित किया जा सकता है।
यहीं भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान के बीच संवाद की जरूरत सामने आती है।
डॉ. अतुल कोठारी ने समकालीन उपयोगिता पर दिया जोर
शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव डॉ. अतुल कोठारी ने भारतीय ज्ञान परंपरा की समकालीन प्रासंगिकता पर बात की।
उद्घाटन के बाद ‘नालन्दा-बोध’ व्याख्यान में भी भारतीय ज्ञान परंपरा और नालंदा की ज्ञान-दृष्टि पर चर्चा हुई। परिसंवाद का आयोजन नालंदा विश्वविद्यालय और शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के संयुक्त तत्वावधान में हुआ था।

15 से ज्यादा कुलपति, 12 से ज्यादा तकनीकी संस्थानों के निदेशक—लेकिन चर्चा सिर्फ शिक्षा तक सीमित नहीं रही
इस आयोजन की खासियत इसकी भागीदारी का दायरा भी रहा। नालंदा विश्वविद्यालय के अनुसार देशभर से 15 से अधिक कुलपति और 12 से अधिक तकनीकी संस्थानों के निदेशक पहुंचे। कई संस्थानों के महानिदेशक और अन्य शिक्षाविद भी इसमें शामिल हुए।
लेकिन यहां आए लोगों की संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण यह था कि चर्चा किन विषयों तक पहुंची।
भारतीय भाषाओं, शिक्षा, शोध, नवाचार, पर्यावरण, सतत विकास और सामाजिक समावेशन जैसे मुद्दों को भारतीय ज्ञान परंपरा के संदर्भ में देखने की कोशिश की गई। इससे परिसंवाद का दायरा केवल इतिहास या संस्कृति तक सीमित नहीं रहा।
भारतीय भाषाएं क्यों बनीं महत्वपूर्ण कड़ी?
राज्यपाल ने भारतीय भाषाओं को ज्ञान-सृजन से जोड़ने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शोध से जोड़ना है तो केवल पुराने ग्रंथों का अनुवाद पर्याप्त नहीं होगा। जरूरत इस बात की भी होगी कि भारतीय भाषाएं आधुनिक शोध, विज्ञान और ज्ञान के निर्माण की भाषाएं बनें।
नालंदा के संदर्भ में यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि ऐतिहासिक नालंदा में अलग-अलग क्षेत्रों से विद्यार्थी और विद्वान आते थे और ज्ञान का आदान-प्रदान होता था।
ज्ञान परंपरा से विकसित भारत तक
दो दिनों की चर्चा का व्यापक संदर्भ विकसित भारत-2047 था। लेकिन इस परिसंवाद से निकलने वाला विचार केवल यह नहीं था कि भारत के पास गौरवशाली अतीत है। इसके बजाय चर्चा का एक महत्वपूर्ण संदेश यह रहा कि—अतीत → शोध → आधुनिक विज्ञान → नवाचार → नया ज्ञान → विकसित भारत
अगर यह श्रृंखला तैयार होती है, तभी भारतीय ज्ञान परंपरा वर्तमान भारत के लिए वास्तविक उपयोगिता हासिल कर सकती है।
नालंदा में कार्यक्रम खत्म हुआ, लेकिन सवाल बाकी हैं
22 सितंबर को परिसंवाद का समापन हुआ। समापन सत्र में कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी ने भारतीय ज्ञान परंपरा की व्यापकता और सार्वभौमिक स्वरूप पर बात रखी। शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव डॉ. अतुल कोठारी ने पाथेय उद्बोधन दिया और भाषा, साहित्य एवं मानवीकी संकाय के संकायाध्यक्ष प्रो. डी. वेंकट राव ने आभार ज्ञापन किया।
लेकिन इस दो दिवसीय आयोजन का वास्तविक मूल्य अब इस बात से तय होगा कि चर्चा से आगे क्या होता है।

क्या विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम बदलेंगे?
क्या भारतीय भाषाओं में नए शोध को बढ़ावा मिलेगा?
क्या प्राचीन ज्ञान परंपराओं पर प्रमाण-आधारित नए शोध होंगे?
क्या तकनीकी संस्थान इस ज्ञान को आधुनिक नवाचार से जोड़ेंगे?
और सबसे बड़ा सवाल-क्या नालंदा एक बार फिर दुनिया के लिए ज्ञान-संवाद का केंद्र बन सकेगा?
नालंदा में दो दिन तक इन सवालों पर चर्चा हुई। अब इनका जवाब आने वाले वर्षों में शोध, शिक्षा और नवाचार के जरिए सामने आएगा।
यही इस परिसंवाद की सबसे बड़ी कहानी है-नालंदा में सिर्फ अतीत को याद नहीं किया गया, बल्कि यह सवाल उठाया गया कि उस अतीत से भविष्य का ज्ञान कैसे बनाया जाए।
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