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Home»राष्ट्रीय»माई लॉर्ड के लिए संविधान अलग है क्या?
राष्ट्रीय

माई लॉर्ड के लिए संविधान अलग है क्या?

Awadhesh Kumar MishraBy Awadhesh Kumar MishraAugust 13, 2026Updated:August 13, 2026No Comments12 Mins Read18 Views
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yashwant varma case जजेज एक्ट के तहत गठित 3 सदस्यीय समिति ने कहा कि जस्टिस वर्मा अपने सरकारी आवास के स्टोर रूम में मिली नकदी की मौजूदगी, उसके स्रोत और मालिकाना हक को लेकर संतोषजनक जवाब देने में नाकाम रहे
yashwant varma case यशवंत वर्मा प्रकरण ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जवाबदेही को लेकर गंभीर संवैधानिक सवाल खड़े किए हैं।
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न्यायपालिका की गरिमा और जवाबदेही के बीच खड़ा Yashwant Varma Case

आरोप सिद्ध हो चुके हैं। संसद की जांच समिति अपनी रिपोर्ट दोनों सदनों में रख चुकी है। फिर भी सबसे बड़ा सवाल वहीं खड़ा है – अब आगे क्या?

भारत में आम नागरिक के लिए कानून का अर्थ होता है। आरोप की जांच, सबूतों की परीक्षा और दोष सिद्ध होने पर कार्रवाई।

लेकिन जब सवाल किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का हो, खासकर न्यायपालिका के किसी सदस्य का, तो क्या कानून की चाल इतनी धीमी हो जाती है कि अंततः न्याय से ज्यादा महत्वपूर्ण पद की प्रतिष्ठा हो जाती है?

Yashwant Varma Case ने इसी असहज प्रश्न को हमारे सामने ला खड़ा किया है।

14 मार्च 2025 की रात दिल्ली स्थित तत्कालीन न्यायाधीश यशवंत वर्मा के सरकारी आवास में आग लगी। आग बुझाने पहुंचे दमकलकर्मियों को स्टोररूम में बड़ी मात्रा में जली और अधजली मुद्रा मिली। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने आंतरिक जांच कराई। बाद में संसद में उनके विरुद्ध पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू हुई और लोकसभा अध्यक्ष ने जांच समिति गठित की।

12 अगस्त 2026 को उस संसदीय जांच समिति की रिपोर्ट दोनों सदनों में रखी गई। रिपोर्ट के अनुसार समिति ने तीनों आरोपों को सिद्ध माना, जिसमें सरकारी परिसर में बेहिसाब नकदी की मौजूदगी और उससे जुड़ी जिम्मेदारी, साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ अथवा उन्हें सुरक्षित रखने में विफलता और जांच के दौरान दिए गए स्पष्टीकरण को टालमटोल वाला मानना।

अब प्रश्न केवल यह नहीं है कि पैसा किसका था।

प्रश्न इससे कहीं बड़ा है।

क्या भारत की न्यायपालिका स्वयं अपने लिए भी वही जवाबदेही स्वीकार करेगी जिसकी अपेक्षा वह हर दूसरे नागरिक से करती है?

अनुच्छेद 217 का असली अर्थ क्या है?

बहस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उस इस्तीफे को लेकर है जो न्यायमूर्ति वर्मा ने 9 अप्रैल 2026 को राष्ट्रपति को भेजा था।

संविधान का अनुच्छेद 217(1)(a) कहता है कि हाईकोर्ट का न्यायाधीश अपने हस्ताक्षर से राष्ट्रपति को संबोधित लिखित पत्र के माध्यम से अपने पद से इस्तीफा दे सकता है। इसमें यह नहीं लिखा कि राष्ट्रपति को उसे “स्वीकार” करना होगा।

और यह कोई केवल किताबी व्याख्या नहीं है।

1978 में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ के सामने Union of India v. Gopal Chandra Misra का मामला आया था। अदालत ने स्पष्ट किया था कि अनुच्छेद 217 के तहत न्यायाधीश का इस्तीफा राष्ट्रपति की स्वीकृति पर निर्भर नहीं है। न्यायाधीश द्वारा संविधान में निर्धारित तरीके से इस्तीफा दिए जाने पर वह प्रभावी होता है।

न्यायमूर्ति वर्मा का पत्र भी “with immediate effect” था।

इसलिए यहां एक असाधारण संवैधानिक विरोधाभास दिखाई देता है।

एक ओर प्रशासनिक स्तर पर यह खबर आती रही कि इस्तीफा अभी स्वीकार नहीं हुआ है। दूसरी ओर संवैधानिक कानून का स्थापित सिद्धांत कहता है कि ऐसे इस्तीफे के लिए स्वीकृति आवश्यक ही नहीं है।

तो फिर सवाल यह होना चाहिए कि –

क्या सरकार ने इस्तीफे को स्वीकार करने की प्रतीक्षा की, जबकि संविधान ऐसी प्रतीक्षा की मांग ही नहीं करता?

अगर हां, तो यह केवल एक प्रशासनिक देरी भर नहीं है। बल्कि यह एक “संवैधानिक प्रक्रिया की गंभीर व्याख्यात्मक समस्या” भी बन गयी है।

फिर संसद ने जांच क्यों जारी रखी?

यह दूसरा बड़ा प्रश्न है।

यदि इस्तीफा प्रभावी हो चुका था, तो क्या संसदीय जांच स्वतः समाप्त हो जानी चाहिए थी?

पुराना उदाहरण हमारे सामने है। न्यायमूर्ति पी.डी. दिनाकरन के मामले में इस्तीफे के बाद जांच समिति की कार्यवाही समाप्त कर दी गई थी। यशवंत वर्मा मामले में लोकसभा अध्यक्ष ने इसके विपरीत रास्ता चुना और समिति को अपना काम पूरा करने दिया। मई 2026 में समिति ने रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दी।

यही कारण है कि वर्मा प्रकरण भारतीय न्यायिक जवाबदेही के इतिहास में एक नया संवैधानिक अध्याय बन गया है।

यहां संसद ने मानो यह कहा कि –

“पद छोड़ देने से सवाल खत्म नहीं होते”।

यह सिद्धांत लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण है।

लेकिन इसके साथ अगला सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

यदि हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया का उद्देश्य किसी वर्तमान न्यायाधीश को पद से हटाना है, तो पद छोड़ चुके व्यक्ति के खिलाफ उस प्रक्रिया का अंतिम परिणाम क्या होगा?

Judges (Inquiry) Act, 1968 की धारा 6 में व्यवस्था है कि यदि समिति आरोपों को सिद्ध मानती है तो रिपोर्ट के साथ हटाने का प्रस्ताव सदन में विचारार्थ लिया जाएगा; दोनों सदनों द्वारा निर्धारित विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होने के बाद राष्ट्रपति को हटाने का अभिभाषण भेजा जाता है।

लेकिन यहां व्यक्ति स्वयं पद से अलग हो चुका है।

इसलिए अब संसद के सामने केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं, बल्कि संवैधानिक कानून की एक अधूरी जगह खड़ी है।

“माई लॉर्ड” होना कानून से ऊपर होना नहीं है

भारतीय न्यायपालिका की स्वतंत्रता लोकतंत्र की रीढ़ है।

लेकिन स्वतंत्रता और जवाबदेही एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।

बल्कि सच्चाई यह है कि जितनी अधिक शक्ति, उतनी अधिक जवाबदेही।

न्यायाधीश किसी सरकार का कर्मचारी नहीं होता। वह संविधान का संरक्षक होता है। उसे इसलिए विशेष सुरक्षा दी गई है ताकि वह सरकार, राजनीतिक दल, मीडिया और जनमत के दबाव से मुक्त होकर निर्णय दे सके।

लेकिन इस सुरक्षा का अर्थ यह नहीं हो सकता कि न्यायपालिका जब गंभीर आरोप लगे हों तो मौन हो जाए।

न्यायाधीश को सुरक्षा इसलिए मिली है कि वह स्वतंत्र होकर न्याय कर सके।

उसे जवाबदेही से मुक्त करने के लिए नहीं।

यह अंतर भूलना खतरनाक होगा।

“आरोप सिद्ध” और “अपराध सिद्ध” – दोनों एक बात नहीं हैं

यहां एक सावधानी भी जरूरी है।

संसदीय जांच समिति द्वारा आरोपों को सिद्ध मान लेना आपराधिक अदालत में दोषसिद्धि के बराबर नहीं है।

समिति का निष्कर्ष संवैधानिक/संसदीय जवाबदेही की प्रक्रिया का हिस्सा है। आपराधिक अपराध के लिए अलग आपराधिक जांच और न्यायिक प्रक्रिया आवश्यक होती है।

यही कारण है कि बहस को “दोषी सिद्ध हो गया, अब जेल भेजो” जैसे राजनीतिक नारे में बदल देना उचित नहीं होगा।

लेकिन इसका उलटा भी उतना ही गलत है कि –

“वह इस्तीफा दे चुके हैं, इसलिए मामला खत्म।”

यदि संसदीय समिति ने तीनों आरोप सिद्ध पाए हैं तो सरकार के सामने कम-से-कम यह सवाल तो खड़ा होता ही है कि क्या उपलब्ध सामग्री के आधार पर स्वतंत्र आपराधिक जांच की आवश्यकता है।

2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने तत्कालीन याचिका में सीधे FIR का आदेश देने से इनकार करते हुए कहा था कि संबंधित संवैधानिक अधिकारियों के समक्ष पहले उचित प्रतिनिधित्व किया जाए; उस समय मामला एक कार्यरत हाईकोर्ट जज से जुड़ा था।

अब यदि व्यक्ति वास्तव में न्यायिक पद से बाहर है, तो संवैधानिक संरक्षण और आपराधिक जांच के बीच की स्थिति भी नए सिरे से स्पष्ट की जानी चाहिए।

सबसे असुविधाजनक सवाल : पैसा आया कहां से?

यहीं यह पूरा मामला अपनी सबसे गंभीर अवस्था में पहुंचता है।

जली हुई मुद्रा कहां से आई?

किसकी थी?

किसने वहां रखी?

वह सरकारी आवास के परिसर में कैसे पहुंची?

आग लगने के बाद उसे किसने हटाया?

क्या उस नकदी की स्वतंत्र वित्तीय जांच हुई?

क्या किसी बैंक, हवाला, दलाल, कारोबारी, वकील या अन्य मध्यस्थ से उसका कोई संबंध सामने आया?

क्या उस समय न्यायमूर्ति वर्मा के समक्ष चल रहे महत्वपूर्ण मामलों, पक्षकारों और उस नकदी के बीच कोई संभावित संबंध जांचा गया?

और सबसे बड़ा सवाल –

क्या इस पूरी कड़ी की आपराधिक जांच कभी उस स्तर तक पहुंची, जहां केवल “न्यायिक कदाचार” नहीं बल्कि संभावित भ्रष्टाचार के स्रोत की पहचान की जा सके?

क्योंकि न्यायपालिका के लिए असली संकट नकदी मिलने से भी बड़ा है।

असली संकट तब पैदा होता है जब नागरिक यह पूछने लगे कि –

“अगर यही रकम किसी सामान्य सरकारी अधिकारी के घर मिलती तो क्या इतनी लंबी संवैधानिक चुप्पी रहती?”

सबूत मिटाने का आरोप और भी गंभीर है

समिति ने साक्ष्यों के संरक्षण और कथित छेड़छाड़ से संबंधित आरोप को भी सिद्ध माना है।

यह आरोप केवल नकदी की कहानी नहीं है।

यशवंत वर्मा प्रकरण ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जवाबदेही को लेकर गंभीर संवैधानिक सवाल खड़े किए हैं।
यशवंत वर्मा

यह न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा प्रश्न है।

किसी अपराध स्थल पर सबूत से छेड़छाड़ का आरोप किसी भी व्यक्ति के खिलाफ गंभीर होता है। लेकिन यदि आरोप किसी न्यायाधीश के संदर्भ में हो तो उसका संस्थागत प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।

क्यों?

क्योंकि न्यायाधीश स्वयं दूसरों के मामलों में साक्ष्य की विश्वसनीयता पर निर्णय देते हैं।

वह तय करते हैं कि कौन सा सबूत स्वीकार्य है और कौन सा नहीं।

इसलिए यदि किसी न्यायाधीश पर ही साक्ष्य के साथ छेड़छाड़ का आरोप सिद्ध होता है, तो यह केवल व्यक्तिगत आचरण का प्रश्न नहीं रह जाता।

यह न्याय की पूरी नैतिक बुनियाद पर प्रश्न बन जाता है।

और यदि इस्तीफा एक रास्ता बन गया तो?

यह शायद इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण संस्थागत प्रश्न है।

मान लीजिए भविष्य में किसी न्यायाधीश पर गंभीर आरोप लगते हैं।

संसद में हटाने की प्रक्रिया शुरू होती है।

जांच समिति बैठती है।

सबूत सामने आते हैं।

और ठीक उस समय न्यायाधीश इस्तीफा दे देता है।

यदि इस्तीफा देकर वह प्रक्रिया के संभावित अंतिम परिणाम – संसदीय रूप से “misbehaviour” सिद्ध होने – से बच जाता है, जबकि उसे सामान्यतः पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ मिल सकते हैं, तो क्या यह व्यवस्था अनजाने में एक “exit without accountability” मॉडल पैदा नहीं कर देती?

यही वह छेद है जिसे संसद को भरना चाहिए।

न्यायपालिका की प्रतिष्ठा बचाने का सबसे अच्छा तरीका कार्रवाई है

कुछ लोग कहेंगे कि ऐसे मामलों को सार्वजनिक करने से न्यायपालिका की प्रतिष्ठा खराब होती है।

मैं इससे असहमत हूं।

प्रतिष्ठा सच छिपाने से नहीं, सच का सामना करने से बचती है।

यदि आरोप गलत हैं तो जांच उन्हें गलत साबित करे।

यदि आरोप सिद्ध हैं तो कार्रवाई हो।

यदि जांच में प्रक्रियागत त्रुटि है तो उसे सार्वजनिक किया जाए।

यदि आपराधिक अपराध का कोई आधार नहीं है तो सरकार स्पष्ट रूप से बताए कि क्यों नहीं है।

लेकिन यह कहना कि “न्यायपालिका की गरिमा के लिए इसे ज्यादा मत कुरेदिए” – यह कुतर्क लोकतंत्र में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

क्योंकि संविधान किसी संस्था की प्रतिष्ठा को नागरिक के अधिकार से ऊपर नहीं रखता।

“मीलॉर्ड” और “मामूली आदमी” के बीच कानून का अंतर कितना?

भारतीय न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत यह रही है कि उसने सिद्धांत दिया कि –

“कानून की नजर में सब बराबर हैं।”

लेकिन जनता कानून की किताब नहीं पढ़ती; वह “व्यवस्था का व्यवहार” देखती है।

एक आम आदमी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगे तो जांच एजेंसियां सक्रिय हो जाती हैं।

किसी अफसर के घर नकदी मिले तो पूछताछ शुरू हो जाती है।

किसी राजनेता के खिलाफ आरोप हों तो वर्षों तक राजनीतिक तूफान चलता है।

लेकिन यदि न्यायपालिका के किसी सदस्य पर गंभीर आरोप हों और कार्रवाई संवैधानिक प्रक्रियाओं, आंतरिक जांचों और इस्तीफे की भूलभुलैया में घूमती रहे, तो नागरिक के मन में एक स्वाभाविक सवाल पैदा होता है कि –

क्या “माई लॉर्ड” के लिए न्याय का पैमाना अलग है?

इस सवाल को पूछना न्यायपालिका विरोधी होना नहीं है।

बल्कि यही सवाल न्यायपालिका को मजबूत करता है।

अब सरकार को क्या करना चाहिए?

सरकार को किसी व्यक्ति को बदनाम करने या किसी संस्था को अपमानित करने की जरूरत नहीं है।

उसे केवल पांच काम करने चाहिए।

पहला – इस्तीफे की संवैधानिक स्थिति पर राष्ट्रपति सचिवालय और विधि मंत्रालय को स्पष्ट सार्वजनिक स्थिति रखनी चाहिए।

दूसरा – संसदीय जांच समिति की पूरी रिपोर्ट और उसके निष्कर्षों को पारदर्शी ढंग से सार्वजनिक विमर्श में आने देना चाहिए। रिपोर्ट दोनों सदनों में रखी जा चुकी है।

तीसरा – समिति द्वारा सिद्ध पाए गए आरोपों के आधार पर आपराधिक कानून के तहत स्वतंत्र जांच की आवश्यकता है या नहीं, इस पर सक्षम प्राधिकारी को स्पष्ट निर्णय लेना चाहिए।

चौथा – यदि मौजूदा कानून में इस्तीफे के बाद जवाबदेही का रास्ता अस्पष्ट है तो संसद को Judges (Inquiry) Act में संशोधन पर विचार करना चाहिए।

पांचवां – न्यायपालिका के लिए ऐसा जवाबदेही तंत्र बनाया जाना चाहिए जिसमें स्वतंत्रता अक्षुण्ण रहे लेकिन जवाबदेही किसी संवैधानिक दीवार के पीछे छिप न जाए।

असली लड़ाई किसी व्यक्ति की नहीं, व्यवस्था की है

Yashwant Varma Case का अंतिम निष्कर्ष चाहे जो हो, इसने भारतीय लोकतंत्र को एक बेहद असुविधाजनक आईना दिखाया है।

एक तरफ न्यायपालिका को राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाना जरूरी है।

दूसरी तरफ न्यायपालिका को जवाबदेही से बचाना लोकतंत्र के लिए उतना ही खतरनाक है।

इन दोनों के बीच संतुलन ही संविधानवाद है।

इसलिए प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि सरकार न्यायपालिका से डरती है या नहीं।

प्रश्न यह होना चाहिए कि –

क्या सरकार संविधान से बंधी है?

और इसका उत्तर होना चाहिए – हाँ।

उसी तरह प्रश्न यह भी होना चाहिए कि –

क्या न्यायपालिका संविधान से बंधी है?

उत्तर फिर वही होना चाहिए – हाँ।

क्योंकि संविधान के ऊपर न संसद है, न सरकार, न न्यायपालिका और न कोई “माई लॉर्ड”।

अंतिम बात

Yashwant Varma Case में सबसे खतरनाक स्थिति यह नहीं होगी कि जांच समिति ने गलती की हो।

सबसे खतरनाक स्थिति यह होगी कि समिति ने तीनों आरोप सिद्ध पाए हों, संसद ने रिपोर्ट पढ़ ली हो, देश ने सवाल पूछ लिया हो – और उसके बाद व्यवस्था फिर उसी पुराने मौन में लौट जाए।

क्योंकि तब जनता के सामने एक बेहद कड़वा निष्कर्ष बचेगा।

“सत्ता के पास जवाबदेही के लिए कानून है, लेकिन जवाबदेही लागू करने के लिए साहस नहीं।”

और यदि ऐसा है, तो दोष केवल किसी एक न्यायाधीश का नहीं होगा।

दोष उस व्यवस्था का होगा जिसने संविधान की किताब में समानता लिखी, लेकिन व्यवहार में कुछ पदों के चारों ओर ऐसी दीवार खड़ी कर दी जिसे आम नागरिक पार नहीं कर सकता।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता पवित्र है।

लेकिन न्यायपालिका की पवित्रता का प्रमाण उसकी आलोचना से बचने में नहीं, बल्कि आलोचना के सामने पारदर्शी और जवाबदेह खड़े होने में है।

आखिर लोकतंत्र में अंतिम “माई लॉर्ड” कोई व्यक्ति नहीं है, बल्कि –

“संविधान” है।

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जहाँ हर खबर एक ज़िम्मेदारी है, और हर शब्द एक वचन। 25 सालों से अधिक के सफर में मैंने टीवी और प्रिंट मीडिया के हर पड़ाव को अपनी नज़रों से देखा, अनुभव किया और उसके माध्यम से समाज के सामने सच को रखा। NEWS18 उत्तराखंड में स्टेट हेड/ असाइनमेंट एडीटर रहते हुए मैं न केवल ख़बरों की निगरानी करता रहा, बल्कि हर मुश्किल घड़ी में, चाहे वह चुनावी घमासान हो या हिमालयी आपदा, सीधे मैदान में उतरकर रिपोर्टिंग करता रहा। सहारा टीवी, ETV, ZEE NEWS, जैन टीवी - हर मंच पर मैंने कंटेंट की आत्मा को समझते हुए समाज के उन मुद्दों को उठाया जिन पर अक्सर चुप्पी छाई रहती है। ईटीवी उर्दू के लिए 'हमारे मसाइल', 'गुफ्तगू', और 'कुछ लम्हें फुर्सत के' जैसे कार्यक्रमों के ज़रिए मैंने केवल बातें नहीं कीं, संवाद रचे। मेरे लिए पत्रकारिता महज़ सूचना देने का माध्यम नहीं, वह समाज की नब्ज़ है। और इस नब्ज़ को पकड़ने की कला मैंने अपने अनुभव, अध्ययन और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से मिले ज्ञान से सीखी है। आज भी जब मैं कैमरे के पीछे या कलम के सामने होता हूँ, तो मन में केवल एक विचार होता है - "जो कहूँ, वह सत्य हो। और जो सत्य हो, वह समाज के काम आए।" यह मेरी यात्रा है, जो एक पत्रकार तक सीमित नहीं, एक ज़िम्मेदार नागरिक की जो संवाद को ही बदलाव का सबसे बड़ा साधन मानता है।

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